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अरे! मर्द हो तो मच्छर बनकर दिखाओ न.

Posted On: 12 Apr, 2012 Others में

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विधाता ने बड़ी फुरसत से बनाया है , मच्छर को. कितनी खूबियाँ हैं एक छोटी सी काया में.कलाबाजी करते हुए उड़ान भरना फिर छिपकर एकाएक प्रकट होना. अपने लक्ष्य को केन्द्रित कर उस पर ही अपना सारा प्यार और संगीत समर्पित करना.लक्ष्य द्वारा प्रतिरोध करने पर चकमा देकर गायब हो जाना.जब तक ये शरीर के इर्द-गिर्द मंडराता है,चैन खो जाता है,नींद खो जाती है.इस अहसास से शरीर का रोम-रोम पुलकित हो जाता है कि मिट्टी से बनी इस काया को ये कहीं न कहीं जरूर प्यार करेगा.इसके संगीत से मंत्रमुग्ध होकर हाथ स्वयं ही उसी दशा और दिशा में संपर्क करने चल पड़ता है.मन तो करता है कि इसकी आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार करवा दें, पर शायद उसकी रगों में अपना ही खून होने के अहसास से निशाना चूक जाता है.
कभी गंभीरता से सोचिए, कितनी मेहनत और कितना जोखिम है उसकी जिन्दगी में. वह अपना भोजन और आपका प्यार पाने के लिए हर समय अपनी जान की बाजी लगाकर आता है.सफल हो गया तो भूख मिटेगी, वर्ना मौत निश्चित है. लोग जाने क्या-क्या अस्त्र लेकर इसके पीछे पड़े रहते हैं. कायल,टिकिया, पेस्ट, लिक्विड,स्प्रे. किसी के हाथ कुछ नहीं पड़ा तो चप्पल लेकर ही….अब तो छोटे-छोटे बच्चे भी कहते हैं कि पुश करो खुश रहो. ये अपने ऊपर होने वाले समस्त आघातों को झेलकर नई स्फूर्ति,नए जोश और नई ऊर्जा के साथ समस्त बाधाओं को लांघते हुए गुनगुनाते हुए पुनः अपने कार्य में तल्लीन हो जाता है. स्प्रे नामक अस्त्र से होने वाले आघात को देखकर लगता है कि ये बंधु-बांधवों सहित परलोक सिधार गया, पर कुछ ही पलों में देखो कैसा पलटी मारकर रॉकेट की गति से चम्पत हो जाता है.इनकी मेहनत,लगन और जिन्जीविषा को सलाम करना ही पड़ेगा.
नियति ने खून ही मच्छर का भोजन बनाया है, वो तो खून पीएगा ही. मच्छर तो अपने पेट की मजबूरी में आता है पर खुलेआम आता है, जान हथेली पर रखकर आता है. पर क्या सिर्फ मच्छर ही खून पीता है? नहीं दीखते हमारे समाज में कई लोग जो खून पीने में मच्छर से कई गुना आगे हैं. दूसरों की हत्या कर ,बलात्कार कर, अत्याचार कर, दूसरों का हक़ छीनकर ये खून ही तो पीते हैं. ये तो साधन संपन्न हैं,नियति ने इनको सब कुछ दिया है. हाथ-पैर दिए, पशुओं से बेहतर दिमाग दिया, काम करने के अवसर दिए. फिर भी ये किसी न किसी तरीके से दूसरों का खून पीने में व्यस्त हो गए.
क्या कह रहे हैं? ये मच्छर की तरह लोगों का खून पी रहे हैं.अरे! मच्छर और इनमें कोई समानता नहीं.मच्छर तो इनसे महान है, बहुत महान. मच्छर तो असली मर्द है, अपना पेट भरने के लिए मेहनत करता है, हमला करने से पहले चेतावनी देता है और एक दो बार थोडा खून पीकर छोड़ देता है.मच्छर कभी मच्छर का खून नहीं पीता है.ये ढोंगी कहने को तो शाकाहारी हैं पर निर्दोष लोगों का खून तब तक पीते हैं, कि अगले की जान निकल जाए. फिर उसके बाद उसकी औलादों का भी खून पीते हैं.इनसे बस एक सवाल है कि ऐसे खून क्यों पीते हो लोगों का? अरे! मर्द हो तो मच्छर बनकर दिखाओ न.

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

कुमार गौरव के द्वारा
April 19, 2012

आदरणीय भूपेश जी सादर प्रणाम बहुत बढ़िया ललित-निबंध. हंसी के साथ सोचने पर मजबूर करती रचना. बहुत-बहुत बधाई आपको. हा…हा…हा…

    Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
    April 20, 2012

    कुमार गौरव जी, आपकी सराहना के लिए धन्यवाद.

April 13, 2012

गहरी सोच, गज़ब प्रस्तुती.. पुरजोर हमला इंसानी(शैतानी) दिमाग पर.. बधाई..

    Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
    April 14, 2012

    टिम्सी जी नमस्कार, आपकी सराहना से व्यंग की प्रस्तुति सार्थक हुई.धन्यवाद.

shashibhushan1959 के द्वारा
April 13, 2012

आदरणीय भूपेश जी, सादर ! बेहतरीन व्यंग्य ! सधा हुआ, कसा हुआ, प्रवाहमय !! अपनी बात सशक्त तौर से कहती हुई रचना ! हार्दिक बधाई !

    Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
    April 14, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी नमस्कार, आपकी सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद.

yogi sarswat के द्वारा
April 13, 2012

क्या कह रहे हैं? ये मच्छर की तरह लोगों का खून पी रहे हैं.अरे! मच्छर और इनमें कोई समानता नहीं.मच्छर तो इनसे महान है, बहुत महान. मच्छर तो असली मर्द है, अपना पेट भरने के लिए मेहनत करता है, हमला करने से पहले चेतावनी देता है और एक दो बार थोडा खून पीकर छोड़ देता है.मच्छर कभी मच्छर का खून नहीं पीता है बहुत सटीक लेख लिखा है आपने ! बहुत सही व्यंग्य और गंभीरता भी !

    Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
    April 14, 2012

    योगी जी नमस्कार , व्यंग पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.आपकी सराहना और बेहतर लेखन को प्रेरित करेगी.

nishamittal के द्वारा
April 13, 2012

अन्योक्ति का प्रयोग यदि कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी शायद बहुत अच्छा प्रस्तुतीकरण

    Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
    April 13, 2012

    आदरणीया निशा जी नमस्कार, सच कहूं तो आप की टिप्पणी से ही मेरा प्रस्तुतीकरण सफल हुआ.सादर धन्यवाद.

dineshaastik के द्वारा
April 13, 2012

सुन्दर भाषा शैली, रोचक  एवं मनोरंजक  आलेख , हास्य एवं व्यंग  में लिपटी हुई सुन्दर रचना के लिये बधाई्….

    Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
    April 13, 2012

    दिनेश जी नमस्कार , आपकी सराहना हमेशा कुछ और बेहतर लिखने को प्रेरित करती है.धन्यवाद .

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 12, 2012

भूपेश जी नमस्कार. बहुत खूब……. लेकिन एक मच्छर ही आदमी को……..

    Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
    April 13, 2012

    दुबे जी नमस्कार , …….. बना देता है.हा .. हा .. हा.

Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
April 12, 2012

चन्दन जी नमस्कार , यह व्यंग सामंजस्य ज़माने के लिए नहीं बल्कि आपके मुस्कुराने के लिए है.त्वरित प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

चन्दन राय के द्वारा
April 12, 2012

Bhupesh Kumar Rai साहब , माफ़ कीजिय महोदय यह लेख का सामंजस्य कुछ जमा नहीं , आपके परिश्रम को मेरा अभिनन्दन , कृपा इसे स्वस्थ रूप में स्वीकारे


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